Monday, October 30, 2023

गोवा राज्याची राज्य कार्यकारिणी पुनर्गठीत केली.


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 दि बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया

राष्ट्रीय संरक्षक  : आदरणीय महाउपासिका मीराताई आंबेडकर

ट्रस्टी चेअरमन  : डॉक्टर हरीश रावलिया

राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष :  आदरणीय डॉक्टर भीमराव यशवंत आंबेडकर

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दिनांक 29/10/2023 रोजी दि बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया चे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आयु. एस.के.भंडारे आणि राष्ट्रीय सचिव आयु. राजेश पवार यांनी सकाळच्या सत्रात चिंतन शिबिर घेतले.

चिंतन शिबिरात राष्ट्रीय सचिव आयु.राजेश पवार यांनी धम्मक्रांती कशी गतिमान करावी या विषयावर मार्गदर्शन केले. त्यानंतर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आयु.एस. के .भंडारे साहेब यांनी प्रबोधनाची आचारसंहिता आणि कार्यालयीन कामकाज या विषयावर मार्गदर्शन केले.

दुपारच्या सत्रात गोवा राज्याची कार्यकारिणी पुनर्गठीत केली.

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गोवा राज्याची नवीन कार्यकारिणी पुढील प्रमाणे.

अध्यक्ष : आयु.एस. के. जाधव

सरचिटणीस : आयु. निखिल एस. प्राजक्ते

कोषाध्यक्ष : आयु.राजू कृष्णा जाधव

उपाध्यक्ष (संस्कार विभाग) : आयु.प्रसाद के. दुधवडे 

उपाध्यक्ष (महिला विभाग ) आयु.छाया मनोहर कोरगावकर

उपाध्यक्ष (प्रचार पर्यटन विभाग) आयु. मीरा कांबळे

उपाध्यक्ष (संरक्षण विभाग) : आयु. किशोर के जाधव

सचिव (संस्कार विभाग) : आयु. सुरेश वामन जाधव

सचिव (महिला विभाग) : आयु. प्रमिला निखिल प्राजक्ते

सचिव ( महिला विभाग) : आयु. भाग्यश्री जितेंद्र कांबळे

सचिव (संरक्षण विभाग ) : आयु.मधुमाला सिद्धार्थ कांबळे

संघटक  : आयु .शिवाजी अर्जुन सोनवणे

संघटक  : आयु .प्रकाश के जाधव

संघटक : आयु. सोनिया राजू जाधव

संघटक :  आयु.रवी एस. दड्डी.

उर्वरित रिक्त पदांवर पदाधिकारी नियुक्त भरून पंधरा मिनिटांसाठी








Tuesday, October 17, 2023

शाखा उत्तर प्रदेश (पश्चिमांचल) का मेरठ में एक दिवसीय चिंतन शिविर

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 दि बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया 

संस्थापक =बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ अंबेडकर

राष्ट्रीय संरक्षक : महोपासिका मीराताई अंबेडकर

ट्रस्टी चेयरमैन : आद. डॉ. हरीश रावलिया

 ट्रस्टी/ राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष : आद. डॉक्टर भीमराव यशवंतराव अंबेडकर

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शाखा उत्तर प्रदेश (पश्चिमांचल) का मेरठ में एक दिवसीय चिंतन शिविर एवम समीक्षा बैठक सफलतापूर्वक संपन्न।

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दिनांक 15 अक्टूबर, 2023 स्थान अशोका बुद्ध विहार, नगला ताशी सरधना बाई पास रोड मेरठ में दि बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया, शाखा उत्तर प्रदेश (पश्चिमांचल) के तत्वावधान में एक दिवसीय चिंतन शिविर एवं समीक्षा बैठक का आयोजन किया गया। बैठक की अध्यक्षता प्रदेश अध्यक्ष आद. राजवीर सिंह बौद्ध ने की तथा संचालन संयुक्त रूप से प्रदेश उपाध्यक्ष(प्रचार/पर्यटन) आद. ब्रिजेश कुमार बौद्ध एवम प्रदेश महासचिव आद. राकेश मोहन भारती ने किया। प्रदेश अध्यक्ष के अनुरोध पर चिंतन शिविर एवं समीक्षा बैठक में केंद्र की ओर से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आद के .पी. सिंह हितैषी मुख्य अतिथि के रूप में एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में राष्ट्रीय संगठक आद जयसिंह सुमन बौद्ध, राष्ट्रीय संगठक आद प्रमोद कुमार गौतम, सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी आद जी एस हरित शामिल हुए। मंचासीन अतिथिगणों द्वारा तथागत बुद्ध एवं बाबा साहब डा अंबेडकर की महान प्रतिमाओं के समक्ष पुष्प अर्पित करने, पूज्य भंते ज्ञानज्योति थेरो से तीन शरण पंचशील ग्रहण करने के साथ ही बैठक की विधिवत कार्रवाई प्रारंभ हुई। 

    प्रथम सत्र में प्रदेश, मंडल, जिला, महानगर आदि शाखाओं के सम्मानित पदाधिकारियों/कार्यकर्ताओं का परिचय हुआ साथ ही जिम्मेदार पदाधिकारियों द्वारा *01 अप्रैल, 2022 से 15 अक्टूबर 2023 तक* की प्रगति रिपोर्ट पेश की गई।   

     भोजन अवकाश के बाद द्वितीय सत्र प्रारंभ हुआ। प्रदेश कोषाध्यक्ष आद सौदान सिंह बौद्ध ने 01 अप्रैल, 2022 से 15 अक्टूबर, 2023 तक *प्रदेश शाखा यूपी (पश्चिमांचल) का आय व्यय का ब्योरा* प्रस्तुत किया। प्रदेश शाखा को उक्त अवधि में विभिन्न स्रोतों से रुपए 10,75,470/= की आमद हुई तथा विभिन्न मदो पर रुपए 9,77,944/=खर्च हुए। रुपए 97,573/= की धनराशि बैंक खाता एवम नकद रुप में शेष है। तदोपरांत प्रदेश अध्यक्ष आद राजवीर सिंह बौद्ध ने विस्तार से प्रदेश शाखा की उक्त अवधि की *प्रगति रिपोर्ट* पेश की, साथ ही जिला प्रभारियों, मंडल अध्यक्षों एवम जिला अध्यक्षों से सक्रिय कार्यकारिणी का गठन कर प्रथम चरण में *एक दिवसीय कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर एवं द्वितीय चरण में 10 दिवसीय एवं बड़े शिविर आयोजित करवाने की पुरजोर अपील की। प्रगति रिपोर्ट की प्रतियां मंचासीन अतिथिगणों, प्रदेश पदाधिकारियों,  मंडल, जिला अध्यक्षों को भी वितरित की गई।  तदोपरांत मंचासीन मुख्य अतिथि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आद के पी सिंह हितैषी, विशिष्ट अतिथिगण राष्ट्रीय संगठक आद जयसिंह सुमन बौद्ध, राष्ट्रीय संगठक आद प्रमोद कुमार गौतम, सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिनी आद जी एस हरित सभी ने यूपी (पश्चिमांचल) में प्रदेश अध्यक्ष आद राजवीर सिंह बौद्ध के नेतृत्व में लगातार किए जा रहे धम्म कार्यों की भूरि भूरि प्रशंशा की साथ ही प्रदेश के सभी जिलों में 24 प्रकार के प्रशिक्षण शिविरों का अयोजन करवाने, धम्म स्मारिका 2023 के प्रकाशन में प्रगति रिपोर्ट एवम आर्थिक सहयोग भेजने, *जिला मेरठ में आगामी 9 नवंबर, 2023 से 19 नवंबर, 2023 तक आयोजित होने वाले श्रामनेर/बौद्धाचार्य, धम्म उपासिका, समता सैनिक दल के शिविरों को सफल बनाने की पुरजोर अपील की। प्रदेश के सभी 22 जिलों में धम्म के प्रचार प्रसार में और गतिशीलता लाने सहित कुछ बिंदुओं पर सुधारात्मक निर्देश भी दिए। 

  प्रदेश उपाध्यक्ष आद समय सिंह बौद्ध (सहारनपुर), प्रदेश संरक्षक आद इंद्रजीत गौतम(अलीगढ़) एवम बी आर गौतम (मेरठ) सभी मंचासीनो ने बैठक को संबोधित किया। बैठक में प्रमुख रूप से प्रदेश सचिव आद तिलक सिंह बौद्ध ( आगरा), आद ईलम सिंह बौद्ध(मुजफ्फरनगर), डॉ बिरमपाल बौद्ध (सहारनपुर), प्रदेश कार्यालय सचिव आद साहब सिंह बौद्ध (अलीगढ़), प्रदेश संगठक आद. सुरेश गौतम, (सहारनपुर), आद वीर सिंह गौतम (मेरठ), आद राजेश कुमार गौतम (मेरठ), आद पुष्पेंद्र कुमार गौतम (मेरठ), सदस्य प्रदेश कार्यकारिणी आद .के. एस. नागराज (सहारनपुर), आद डॉ सतीश मधुर(मंडल अध्यक्ष मेरठ), आद राजवीर सिंह गौतम जिला अध्यक्ष मेरठ अपनी कार्यकारिणी सहित, आद .अशोक कुमार कैम जिला अध्यक्ष मथुरा, आद किशोर सिंह जिला महासचिव मथुरा, आद अनुज कुमार बौद्ध जिला अध्यक्ष हापुर, आद सलेकचंद्र आनंद जिला उपाध्यक्ष हापुर, आद लोकेश प्रभाकर महासचिव हापुर, आद विनोद कुमार गौतम जिला संगठक हापुर, आद विजय कुमार आचार्य हापुर, आद राजकुमार बौद्ध जिला अध्यक्ष सहारनपुर, आद जसमेर सिंह जिला महासचिव सहारनपुर, एडवोकेट सुमित् बौद्ध सहारनपुर, आद राजेंद्र बौद्ध जिला उपाध्यक्ष गाजियाबाद, आद. कृपा शंकर जिला कोषाध्यक्ष गाजियाबाद, डॉ. मिथिलेश गौतम प्राचार्य मेरठ, आद .रजनी मधुर, आद .गरिमा सिंह, आद बबीता, आद .कोमल सिंह, आद. रेनू लवानिया सहित मेरठ जिला से भारी संख्या में सम्मानित पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित थे। प्रदेश एवम जिलों के कुछ पदाधिकारी चैत्य भूमि दादर मुंबई में संचालित केंद्रीय शिक्षक शिविर में शामिल होने के कारण उपस्थित नहीं हो सके। सब्ब सुक्ख गाथा के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

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 धम्म सेवा में

👇आपका धम्म बंधु👇

राजवीर सिंह बौद्ध

 प्रदेश अध्यक्ष

दि बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया 

उत्तर प्रदेश (पश्चिमांचल)

दिनांक 16 अक्टूबर, 2023















धम्म,अधम्म, सत् धम्म



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            दि बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया

संस्थापक अध्यक्ष  : डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर

संरक्षक  : आदरणीय महाउपासिका मीराताई आंबेडकर

ट्रस्टी चेअरमन  : डॉक्टर हरीश रावलिया

राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष  : डॉक्टर भीमराव यशवंत आंबेडकर

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दिनांक 16 ऑक्टोबर 2023 रोजी चैत्यभूमी दादर येथे केंद्रीय शिक्षक शिबिरात संस्थेचे राष्ट्रीय सचिव आयुष्मान राजेश पवार यांनी धम्म अधम्म सत् धम्म हा विषय शिकविला. सदर विषय हिंदी भाषेमध्ये पुढील प्रमाणे शिकविला.

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धम्म क्या है?

1. धम्म दुख से मुक्ति का सिद्धांत है।

1. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा तैयार पाली-अंग्रेजी शब्दकोश के अनुसार, पाली शब्द धम्म का अर्थ है प्रकृति, गुण, उद्देश्य, कर्तव्य, कार्य, उद्देश्य, विचार,और बुद्ध द्वारा कहे गए सिद्धांत, सिद्धांत, नियम और सत्य हैं। " 
 पाली-अंग्रेज़ी शब्दकोश में डॉ. अम्बेडकर द्वारा दिये गये अर्थ का सिंहावलोकन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि पाली शब्द धम्म के दो अर्थ हैं।
 सबसे पहले, धम्म एक सिद्धांत, सिद्धांत या नियम है। प्रश्न यह है कि इस नियम का संबंध किससे है? बुद्ध की शिक्षाओं के विश्लेषण से पता चलता है कि यह  सिद्धांत दुख से मुक्ति के मार्ग से संबंधित है। इसमें पंचस्कंद  के नियम और निर्सगा में होने वाली सभी प्रक्रियाएं शामिल हैं।
 इस प्रकार, धम्म कार्य-कारण के सिद्धांत और ब्रह्मांड में सभी प्रक्रियाओं के नियमों पर आधारित मानव मन की कार्यप्रणाली का नियम है।
 इनमें तृष्णा का उद्भव, विकारों का निर्माण, शरीर के प्रति जागरूकता का उद्भव और अष्टांगिक मार्ग का पालन करके विकारों और तृष्णाओं का पूर्ण उन्मूलन शामिल है।

 धम्म शब्द का दूसरा अर्थ है मन में उत्पन्न होने वाले विचार, भावनाएँ, विकार आदि। क्रोध, घृणा, मोह, प्रेम, संदेह आदि कई प्रकार के विचार और भावनाएँ मन में पल-पल उठते रहते हैं। यह विचार मन में विकार सहित प्रकट होते हैं। इन विकारों को धम्मा कहते हैं। जो कोई मन में उत्पन्न होता है उसी को धम्म कहते हैं।

 नियम

1. यदि हम अपने आस-पास की प्रकृति का अवलोकन करें तो यह स्पष्ट होता है कि प्रकृति में अनेक प्रक्रियाएँ कुछ निश्चित नियमों के अनुसार होती हैं।

 ग्रह, तारे, उपग्रह अपनी विशिष्ट कक्षाओं में घूमते हैं। प्राणियों का जन्म और मृत्यु भी कुछ नियमों के अनुसार होती है।
 संक्षेप में कहें तो ब्रह्माण्ड में सभी प्रक्रियाएँ इसी विशिष्ट नियम के अनुसार होती हैं।

 प्राकृतिक नियम के अनुसार मनुष्य का जन्म ब्रह्माण्ड के एक भाग के रूप में हुआ है और उसका मन भी ब्रह्माण्ड का एक भाग है।

 दुख से मुक्ति प्राप्त करना बुद्ध की शिक्षाओं का मुख्य उद्देश्य है। बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं में छह इंद्रियों के अपने विषयों के साथ संपर्क को बहुत महत्व दिया है। जब छह इंद्रियां वस्तुओं के संपर्क में आती हैं, तो वे त्वचा पर संवेदना उत्पन्न करती है।

 बुद्ध ने इन संवेदनाओं की वास्तविक प्रकृति का अध्ययन किया और पाया कि ये संवेदनाएँ अनित्य हैं। ये संवेदनाएँ लगातार बदलती रहती हैं। यह अनुभूति निरंतर उठती और मिटती रहती है।

 इन संवेदनाओं का ध्यानपूर्वक अध्ययन करने के बाद, बुद्ध को एहसास हुआ कि ये संवेदनाएँ तीन प्रकार की होती हैं: सुखद, दुखद और अदुखद- असुखद।

 सामान्य परिस्थितियों में मानव मन इन संवेदनाओं की अनित्य प्रकृति को समझे बिना उन पर प्रतिक्रिया करता है।

 यदि संवेदनाएं सुखद हैं तो मानव मन उन संवेदनाओं का निरंतर आनंद लेने की इच्छा पैदा करता है। इससे तृष्णा उत्पन्न होती है और क्रोध या मोह विकार उत्पन्न होता है। यदि संवेदनाएँ दर्दनाक हैं, तो मन अपेक्षा करता है कि संवेदनाएँ तुरंत दूर हो जाएँ। इससे भी तृष्णा उत्पन्न होती है और घृणा का विकार भी जन्म लेता है। यदि अनुभूति अदुखद - असुखद है, तो मन उस अनुभूति से अनभिज्ञ है, मन उस अनुभूति को नहीं जानता है। इससे अज्ञानता का विकार उत्पन्न होता है।

 बुद्ध ने आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से महसूस किया कि यदि इंद्रियों को वैसे ही देखा जाए जैसे वे हैं और उनके भीतर के अनित्य सिद्धांत को समभाव से देखा जाए, तो उन संवेदनाओं से जुड़े विकार धीरे-धीरे कम हो जाते हैं।
 
यदि एकाग्र एवं सूक्ष्म मन से इन संवेदनाओं के वास्तविक स्वरूप को समझा जाए और  यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहे तो निरंतर जागरूकता के कारण विकार कमजोर हो जाता है।वे मन से पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।  मानसिक विकारों के पूर्ण विनाश की अवस्था  को निब्बाण कहते है। 

 हालाँकि, मन की एकाग्रता प्राप्त करने के लिए, शील, समाधी और प्रज्ञा द्वारा आर्यअष्टांग पथ का अनुसरण करना आवश्यक है।

 तृष्णा की उत्पत्ति और तृष्णा के पूर्ण विनाश का यह सिद्धांत प्रतीत्यसमुत्पाद है।

 इस प्रकार, धम्म मानव मन की कार्यप्रणाली और ब्रह्मांड की सभी प्रक्रियाओं के बारे में प्राकृतिक सत्य का नियम है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि धम्म प्रकृति का नियम है।

 बुद्ध ने पाँच नियम प्रतिपादित किये:

1. उतू नियम

२. बीज नियम

३. कम्म नियम

४. चित्त नियम

५ )धम्म नियम

 उतू नियम

उतू नियम का अर्थ है प्रकृति में विकास, निरंतरता, सुधार और अंत
इस विषय में विशिष्ट नियमों द्वारा शासित एक प्रक्रिया है।

 उत्तु नियम इस प्रक्रिया की व्याख्या करता है कि कैसे सर्दी, गर्मी और मानसून के मौसम एक के बाद एक आते और जाते हैं। पेड़, लताएँ, झाड़ियाँ, घासें निश्चित मौसम में फल और फूल देती हैं। इसकी प्रक्रिया उतु नियम है।

 ये सभी प्रणालियाँ प्राकृतिक रूप से बनाई गई हैं, किसी के द्वारा नहीं बनाई गई हैं। इस व्यवस्था को उत्तु नियम कहा जाता है क्योंकि यह प्राकृतिक नियम के अनुसार होता है।

 उत्तु का अर्थ है ऊर्जा, यह अग्नि का प्राथमिक गुण है। सभी प्रक्रियाएँ ऊर्जा के कारण होती हैं और ऊर्जा का वह तत्व जो उन्हें घटित कराता है, उसे उतू कहते है।

 भगवान बुद्ध और उनका धम्म में डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर ने उत्तु नियम और बीज नियम की व्याख्या की है। भगवान बुद्ध और उनका धम्म पुस्तक का प्रासंगिक भाग इस प्रकार है।

 “इस पार्थिव संसार में एक प्रकार की व्यवस्था है। निम्नलिखित घटनाएँ साबित करता है।

 आकाश में ग्रहों की गति में एक प्रकार का क्रम होता है।

 ऋतु चक्र में भी व्यवस्था है।
 कुछ व्यवस्थाओं के अनुसार ही बीज वृक्ष बनते हैं। पेड़ से फल की उपज और फल से पुनः 'बीज' उत्पन्न होता है। 
 बौद्ध भाषा में इस प्रणाली को नियम कहा जाता है। एक के बाद एक व्यवस्थित
जो नियम सृष्टि का संकेत देते हैं उन्हें ऋतु नियम , बिजनियम् कहा जाता है।” 

 बुद्ध ने दीघनिकाय के वासेत्थ सुत्त में उत्तु नियम की व्याख्या की है

 बीज नियम

 एक पौधा एक बीज से विकसित होता है और उससे अलग-अलग शाखाएँ निकलती हैं।

बीज कई प्रकार के होते हैं। जड़, तना, पत्तियाँ आदि को बीज कहा जाता है ।क्योंकि कुछ पौधों की जड़, तना तथा पत्तियों से नये पौधों का निर्माण होता है।

 हम जानते हैं कि बीज भोजन को ऊर्जा के रूप में संग्रहित करते हैं। इस प्रकार, सभी प्रकार के पौधों में, पुनर्जनन और विकास के लिए आवश्यक ऊर्जा बीज नामक ऊर्जा में निहित होती है।

 बीज विधान के अनुसार आम के बीजों से निकलने वाले अंकुर, तने, शाखाएँ, कलियाँ, पत्तियाँ, फूल और फल सदैव एक ही प्रजाति के होते हैं। 
यह सिद्धांत सभी प्रकार के पेड़ों, लताओं, झाड़ियों, घासों पर लागू होता है।

 यह किसी के द्वारा निर्मित नहीं है, बल्कि यह सब प्रकृति की इस सतत व्यवस्था के कारण है। इस प्रणाली को बीज नियम कहा जाता है। पाली ग्रंथों में तथागत ने पांच प्रकार के बीज का उल्लेख किया है। फल में जड़, तना, सरल, शाखा और बीज से पांच प्रकार के बीज उत्पन्न होते हैं।

 कम्म नियम

 कम्म का अर्थ है काया, पढ़ना और मन की कुशल या अकुशल क्रिया। 
 कर्म का नियम अच्छे कर्मों के अच्छे, सुखद और वांछनीय कार्यों का सटीक परिणाम है, और बुरे कार्यों का अप्रिय और अवांछनीय परिणाम है।

 अंगुत्तरनिकाय में कम्मा नियम का महत्व निम्नलिखित शब्दों में बताया गया है:

 “किसी के जीवन को मारने का फल अपने जीवन को छोटा करना और अपने लंबे जीवन को घटाना  है। ईर्ष्या कई संघर्ष पैदा करती है, लेकिन मानवता शांति पसंद करती है। गुस्सा इंसान की खूबसूरती को खत्म कर देता है। इसके विपरीत, संयम से कर्तव्य की भावना बढ़ती है, शत्रुता से कमजोरी आती है, और स्नेह से शक्ति आती है। इसके विपरीत चोरी करने से दरिद्रता आती है।


ईमानदारी से काम करने से धन की प्राप्ति होती है। अहंकार प्रतिष्ठा और दुख की ओर ले जाता है, जबकि शील और नम्रता सम्मान की ओर ले जाती है। मूर्ख की संगति मनुष्य को ज्ञान से दूर कर देती है और दूसरे बुद्धिमान पुरुषों की संगति करने से ज्ञान बढ़ता है। "

जीवित प्राणियों का भाग्य उनके स्वयं के कार्यों पर निर्भर करता है और कर्म का नियम इस बात पर जोर देता है कि एक व्यक्ति कभी भी दूसरे के दुख को दूर नहीं कर सकता है और प्रत्येक व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है।


 डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर कम्मा नियम से पूरी तरह सहमत थे। अपनी पुस्तक भगवान बुद्ध और उनका धम्म में डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर ने कर्म के नियम की व्याख्या की है। उनके अनुसार कर्म ब्रह्मांड की  नैतिक व्यवस्था बनाये रखना । डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर लिखते हैं की “समाज में भी इस प्रकार की नैतिक व्यवस्था है। यह कैसे उत्पन्न होता है? इसका रखरखाव कैसे किया जाता है?

 इस प्रश्न का उत्तर उन लोगों के लिए कठिन नहीं है जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं। उत्तर सीधा है।

 वह कहते हैं, 'संसार की नैतिक व्यवस्था ईश्वर की इच्छा का परिणाम है। ईश्वर ने संसार की रचना की और 'ईश्वर' ही इस संसार का कर्ता-धर्ता है। वह भौतिक एवं नैतिक नियमों का कर्ता है।

 उनके अनुसार नैतिक नियम मनुष्य की भलाई के लिए हैं, क्योंकि वे ईश्वरीय आदेश हैं। हमारे निर्माता, ईश्वर की आज्ञाकारिता उनका आदेश है, और यह नैतिक आदेश ईश्वर की आज्ञा का पालन करता है।


 जो लोग यह मानते हैं कि नैतिक व्यवस्था परमात्मा का परिणाम है, उनका उपरोक्त विचार होगा।

 यह परिभाषा बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं है। क्योंकि यदि ईश्वर नैतिक नियमों का प्रवर्तक है, इन नैतिक नियमों का आरंभ और अंत है, और मनुष्य को ईश्वर की आज्ञा मानने से कोई मुक्ति नहीं है, तो इस दुनिया में इतनी नैतिक अव्यवस्था क्यों है?

 इन ईश्वरीय नियमों के पीछे कौन सा अधिकार है? भगवान के नियमों का
व्यक्तियों के पास क्या अधिकार हैं? ये समग्र प्रश्न हैं. लेकिन जो लोग यह मानते हैं कि नैतिक व्यवस्था ईश्वरीय व्यवस्था का परिणाम है, उनके पास इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं होगा।

 इस समस्या को दूर करने के लिए सिद्धांत को थोड़ा संशोधित किया गया है।  ऐसा कहा जाता है कि सृष्टि की रचना ईश्वर की आज्ञा से हुई। ये भी
सच  है कि इन सभी ब्रह्माण्डों ने प्रभु की इच्छा व मार्गदर्शन के अनुसार ही अपना कार्य प्रारम्भ किया। यह भी सच है कि उन्होंने एक बार उस पूरे ब्रह्मांड को शाश्वत गति, शक्ति दी थी और वही उस ब्रह्मांड की सभी गतिविधियों का स्रोत है।

 लेकिन इसके बाद, ईश्वर ने सृष्टि को उन नियमों के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता दी जो उसने शुरुआत में निर्धारित किए थे। 
 इसलिए, यदि नैतिक व्यवस्था ईश्वर की इच्छा का पालन नहीं करती है, तो यह एक दोष  प्रकृति का है। भगवान का नहीं। 

 सिद्धांत में इतने परिवर्तन से भी उपरोक्त समस्या हल नहीं होती। 

इस सिद्धांत में परिवर्तन केवल (नैतिक व्यवस्था की) जिम्मेदारी को ईश्वर पर स्थानांतरित नहीं करता है। परन्तु प्रश्न यह है कि ईश्वर को अपने नियम का कार्यान्वयन सृष्टि (प्रकृति) को क्यों सौंपना चाहिए? ऐसे अनुपस्थित भगवान का क्या लाभ?

 सृष्टि में नैतिक व्यवस्था कैसे कायम रहे, इस प्रश्न पर भगवान बुद्ध का उत्तर बिल्कुल अलग है।

 तथागत का उत्तर सरल है. अर्थात् नैतिक व्यवस्था ईश्वर के अधीन नही बल्कि, इसे कर्म के नियमों के अनुसार बनाए रखा जाता है। 

 सृष्टि का नैतिक क्रम अच्छा या बुरा हो सकता है, परन्तु बुद्ध के अनुसार यह मनुष्य को सौंपा गया है। किसी और पर नहीं।

25. 'कम्म' (कर्म) का अर्थ है मनुष्य द्वारा किया गया कार्य और विपाक का अर्थ है उसका परिणाम। यदि नैतिक व्यवस्था ख़राब है तो इसका कारण यह है कि मनुष्य अकुशल कर्म करता है। यदि नैतिक व्यवस्था अच्छी है, तो इसका अर्थ केवल यह है कि व्यक्ति कुशल कर्म (अच्छे कर्म) कर रहा है।

 भगवान बुद्ध केवल कर्म की बात नहीं कर रहे हैं। वह कर्म के नियमों की भी व्याख्या करते हैं जिन्हें वे कम्मनियम कहते हैं।

  कम्मनियम के बुद्धप्रणिते
विचार यह है कि जैसे रात के बाद दिन आता है, वैसे ही कर्म अपने परिणाम के बाद आता है। यह एक नियम है।
 
 कुशल कर्म का लाभ प्रत्येक कुशल कर्म करने वाले को मिलता है।

और अकुशल कर्म के परिणामों से कोई नहीं बच सकता। 
 इसलिए, जैसा कि भगवान बुद्ध ने उपदेश दिया था, ऐसे कुशल कार्य करो कि मानवता को एक अच्छे नैतिक आदेश से लाभ होगा क्योंकि केवल कुशल कार्यों के माध्यम से ही।

नैतिक व्यवस्था बनी रहती है. अकुशल कार्य न करें, क्योंकि ऐसा नैतिक व्यवस्था क्षतिग्रस्त हो जाती है और मानवता पीड़ित होती है। 

यह संभव है कि कर्म और कर्म के प्रभाव दोनों के बीच कुछ समय का अंतराल हो। ऐसा अक्सर होता है।

 इस दृष्टीसे कम्म के तीन विभाग होते हैं।
 (१) दिठ्ठ धम्म वेदनीय कम्म (तत्काल फल देने वाला कम्म), 
(२) उपपज्जवेदनीय कम्म (जिसका परिणाम देर से होता है।)
(३) अपरापरियवेदनीय कम्म (अनिश्चित काल में फल मिलता है।).

 एक कर्म कभी-कभी 'अहोसी' कर्म बन सकता है, जिसका अर्थ है कि इसका कोई प्रभाव नहीं होता है। अहोसि कर्म में वे कर्म शामिल हैं जो अपने अंगों की कमजोरी के कारण विपाक या प्रभाव उत्पन्न नहीं करते हैं, या जो अन्य मजबूत कर्मों द्वारा प्रतिस्थापित किए जाते हैं।

 इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए भी, भगवान बुद्ध का सिद्धांत कि 'कर्म का नियम अनिवार्य है।

 कर्म का विपाक केवल कर्ता को ही भोगना पड़ता है और इसका कोई अन्य अर्थ नहीं है, कर्म सिद्धांत में यह अर्थ नहीं है। यह मान लेना ग़लत है कि केवल फीडबैक ही है। कभी-कभी एक के कर्म का परिणाम उसके बजाय दूसरे को भुगतना पड़ता है; हालाँकि, ये सभी कर्म नियम के ही परिणाम हैं, क्योंकि यह कर्म नियम ही है जो नैतिक व्यवस्था को बनाए रखता है या तोड़ता है।

 व्यक्ति आते हैं, जाते हैं; लेकिन ब्रह्माण्ड की नैतिक व्यवस्था बनी रहती है और इस व्यवस्था को बनाने वाला कम्म नियम भी कायम रहता है।

इस कारण से, भगवान बुद्ध के धर्म में, अन्य धर्मों में भगवान को जो स्थान मिलता है, वह नीति को मिलता है। 

 इसलिए भगवान बुद्ध ने ब्रह्माण्ड की नैतिक व्यवस्था कैसे कायम रहती है इस बारे में बहुत ही सरल उत्तर दिया है।
बुद्ध द्वारा दिया गया उत्तर बहुत सीधा और निर्विवाद है। 

हालाँकि, इस उत्तर का सही अर्थ कम ही समझ में आता है। इसकी लगभग हमेशा ग़लत व्याख्या की जाती है, ग़लत व्याख्या बताइ जाती है । नैतिक व्यवस्था कैसे कायम रखी जाए, इस प्रश्न के उत्तर के रूप में भगवान बुद्ध ने कर्म सिद्धांत का प्रस्ताव रखा। इस सच्चाई से बहुत कम लोग वाकिफ हैं.

 हालाँकि, कम्म सिद्धांत प्रस्तुत करने में बुद्ध का यही उद्देश्य था।

 कर्म के नियम केवल सामान्य नैतिक व्यवस्था से संबंधित हैं। व्यक्ति का इसका सौभाग्य या दुर्भाग्य से कोई लेना-देना नहीं है।

 इसका उद्देश्य ब्रह्माण्ड में नैतिक व्यवस्था बनाये रखना है। 
 इस कारण से 'कम्म नियम' धम्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। "

 चित्त नियम

 चित्त मन है.
 चित्त नियम सत्य है कि मन छह इंद्रियों की वस्तुओं के संपर्क से प्राप्त ज्ञान के अनुसार कार्य करता है।
 इससे प्राप्त जानकारी से मन, विज्ञान, संज्ञा, वेदना और संस्कार के चार स्कंध एक के बाद एक संस्कार उत्पन्न करने का कार्य करते हैं।
 छह इंद्रियों और उनकी प्रकृति की पहुंच के भीतर आने वाले विभिन्न विषयों पर जो चेतना (विज्ञान) उत्पन्न होती है वह भिन्न है। चेतना में परिवर्तन के कारण संज्ञा भी बदल जाती है। ज्ञान में परिवर्तन से भावनाएँ या प्राकृतिक इच्छाएँ बदल जाती हैं और इससे क्रिया या कर्म भी बदल जाता है। 

 चित्त नियम का अर्थ है मन में उठने वाले विचार और जागरूकता परिणाम नियम है।

 धम्म नियम

 धम्म का अर्थ है नियम, सिद्धांत, विचार, भावनाएँ आदि। 
 मन में जो एक खास विचार या भावना उठती है, उसे तन और वानी से
मन की एक निश्चित क्रिया होती है। इसे धम्म नियम कहा जाता है।

 हम जानते हैं कि मन अग्रणी है, यह सभी चीजों में सर्वोच्च है, यह क्रिया के निर्माण का कारण है।

 


'मन ही सबका मूल है, मन ही स्वामी है, मन ही कारण है। 

 'यदि मन में बुरे विचार हों तो मनुष्य के विचार, वचन और कर्म भी बुरे हो जाते हैं। पाप रथ के पहियों की तरह दुःख का कारण बनता है ,वे उसका वैसे ही पीछा करते हैं जैसे घोड़े का करते हैं।

 'मन ही हर चीज़ का मूल है। यह आदेश देता है और यह घटनाओं का कारण बनता है। '

'यदि मन में अच्छे विचार हों तो शब्द और कर्म दोनों अच्छे होते हैं और ऐसे अच्छे कर्मों से उत्पन्न होने वाली खुशी पदार्थ की छाया की तरह मनुष्य का पीछा करती है। '

.. अधम्म क्या है ||

1. दैवीय चमत्कारों पर विश्वास करना अधम्म है। बुद्ध का धम्म बुद्धिवाद सिखाता है, दैवीय चमत्कारों का खंडन करता है और इसके पीछे भगवान बुद्ध के तीन उद्देश्य थे। 
A) व्यक्ति को बौद्धिक बनाना. 
ख) व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से सत्य की खोज करने के लिए प्रोत्साहित करना। 
ग) भ्रम की उत्पत्ति को नष्ट करना जो मनुष्य की खोज करने की प्रवृत्ति को मार देता है ।भगवान बुद्ध के तीन उद्देश्यों को बुद्ध धम्म या उद्देश्यपूर्णता का सिद्ध कहा जाता है ।यह बुद्ध धम्म का मुख्य सिद्धांत है। हमें यह समझना चाहिए कि किसी भी घटना में कोई दैवीय चमत्कार नहीं होता है। घटना के पीछे प्राकृतिक या मानवीय कारण है। भगवान बुद्ध कहते हैं कि प्रत्येक घटना का एक कारण होता है। कोई भी घटना बिना कारण के घटित नहीं होती।

2. ईश्वर में विश्वास करना अधम्म है। भगवान बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व को नकारा है, ईश्वर में विश्वास रखने वाले लोग कहते हैं कि संसार ईश्वर ने बनाया है लेकिन उन्होंने ईश्वर नामक किसी अज्ञात अदृश्य शक्ति को नहीं देखा है क्योंकि उस ईश्वर के अस्तित्व को कोई सिद्ध नहीं कर सका। यह दुनिया विकसित हो गई है। वैज्ञानिक ने कहा है कि इसे विकसित कर लिया गया है।इसलिए ईश्वर पर विश्वास करना अधम्म है।

3. ब्रह्म सायुज पर आधारित धर्म अधम्म है। भगवान बुद्ध कहते हैं कि ईश्वर में विश्वास धम्म का हिस्सा नहीं है, जैसे ब्रह्म धम्म का हिस्सा नहीं है। ब्रह्म अदृश्य है और इसका अनुभव कोई नहीं कर सकता। अत: यह मानना ​​कि ब्रह्म केवल काल्पनिक है, अधम्म है।

भगवान बुद्ध कहते हैं कि किसी चीज़ को सत्य मानने के लिए उसमें कुछ हद तक अनुमान होना चाहिए, जैसे कि ब्रह्मा के बारे में कोई अनुमान या डिग्री नहीं मिलती। अतः ब्रह्म सायुज्य में विश्वास गलत है।

4. आत्मा में विश्वास अधम्म है। भगवान बुद्ध ने आत्मा को अस्वीकार किया है। आत्मा पर आधारित धर्म काल्पनिक है क्योंकि आज तक किसी को भी जानवर के शरीर में आत्मा नाम का कोई अंग नहीं मिला है। आत्मा का कोई रूप नहीं है. आत्मा वास्तविकता नहीं है क्योंकि रंग रूप नहीं है, गंध नहीं है। आत्मा एक कल्पना है. अतः इस पर विश्वास करना अधम्म है। भगवान बुद्ध कहते हैं कि हमारा शरीर चार भौतिक तत्वों से बना है। आप, तेज, वायु और पृथ्वी ये चार पदार्थ हैं। आत्मा को मन के माध्यम से कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं है, जो मनुष्य या जानवर द्वारा किया जाता है। इसलिए भगवान बुद्ध कहते हैं कि आत्मा में विश्वास अधम्म है।

5. यज्ञयाग में विश्वास अधम्म है। ब्राह्मणवाद एक ऐसा धर्म है जो यज्ञ में विश्वास रखता है। इन यज्ञों को नित्य यज्ञ कहा जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि यह नियमित है। भगवान बुद्ध ने इस मान्यता को अस्वीकार कर दिया है कि बलि इसलिए दी जानी चाहिए क्योंकि उससे फल मिलता है, जानवरों की बलि दी जाती है,  बलि किये गये जानवरों का मांस खाया जाता है। भगवान बुद्ध ने यज्ञ में पशुओं की बलि देने की प्रथा का विरोध किया। यज्ञयाग में विश्वास अधम्म है क्योंकि इसने इसके खिलाफ विद्रोह किया और उस प्रथा को बंद कर दिया।

6. कल्पना पर आधारित धर्म अधम्म है। इस ब्रह्माण्ड की रचना कैसे हुई? संसार का विनाश कब और कैसे होगा? ऐसे प्रश्नों के बारे में सोचना अपना कीमती समय और जीवन बर्बाद करना है। इन प्रश्नों के उत्तर का मनुष्य और समाज के कल्याण से कोई लेना-देना नहीं है।
इसलिए काल्पनिक अटकलों में विश्वास अधम्म है।

7. केवल धर्मग्रन्थों का पाठ करना ही अधम्म है। जो लोग केवल शास्त्रों का पाठ करते हैं उनके स्थान पर शील होना चाहिए क्योंकि शील के बिना विद्या अनाशवान का कारण है। ज्ञान के बिना शील भी अधूरा है। इसलिए शील और विद्या को साथ-साथ चलना चाहिए। केवल विद्या ही धम्म का अंग नहीं है. विनय के बिना ज्ञान का दुरुपयोग किया जा सकता है।

8. अधम्म यह विश्वास करना है कि शास्त्र बिल्कुल सत्य हैं। किसी धार्मिक ग्रंथ पर अंध विश्वास स्वतंत्रता की दृष्टि को नष्ट कर देता है जिससे व्यक्ति खोज नहीं कर पाता। साथ ही धार्मिक पुस्तक की आलोचना भी नहीं कर सकते. हर चीज़ का परीक्षण होना चाहिए और समय के साथ बदलना भी चाहिए। इसलिए यह मानना ​​कि शास्त्र प्रमादी (सत्य) हैं, अधम्म है।

॥ सद्धम्म क्या है?

1. सद्धम्म का पहला कार्य मन की अशुद्धियों को दूर करना है। व्यक्ति के जीवन में मानसिक प्रसन्नता रहती है। मन सभी क्रियाओं पर हावी है। यदि मन में विचार प्रत्यक्ष हों तो उस मन के बोल और कर्म भी प्रत्यक्ष हो जाते हैं। इससे समाज और स्वयं को नुकसान होता है। अगर मन में अच्छे विचार हों तो उस व्यक्ति की वाणी और कर्म दोनों अच्छे होते हैं। और ऐसे अच्छे कर्मों से मिलने वाली खुशी परछाई की तरह हमारे साथ चलती है। इससे समाज में दया, सद्भावना, प्रेम, मैत्री की वृद्धि होती है तथा समाज में शांति एवं न्याय की भावना उत्पन्न होती है। इससे मन की मलिनता दूर होकर दृष्ट विचारों से दूर रहकर सामाजिक एवं आत्म-कल्याण की प्राप्ति होती है।

2. विश्व को धम्म का साम्राज्य बनाने का अर्थ है धार्मिक सद्गुणों का साम्राज्य बनाना। बौद्ध धर्म में स्वर्ग या नर्क जैसी कोई चीज़ नहीं है। 
'बौद्ध धर्म यह नहीं मानता कि ईश्वर के शासन के अधीन कोई राज्य है। धर्म व्यक्ति के सद्गुणों के माध्यम से एक राज्य बन सकता है। दुनिया में दुख को नष्ट करने के लिए सदाचार बहुत आवश्यक है। अतः धर्मराज्य और सदाचार में घनिष्ठ संबंध है। कष्ट निवारण के लिए • प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे मनुष्यों के साथ धर्म का व्यवहार करना चाहिए, तभी संसार में धम्मराज्य की स्थापना होगी।

3. धम्म का लक्ष्य है कि सबसे मुक्त धम्म विद्या यानी सद्धम्म विद्या यानी ज्ञान को बढ़ावा दिया जाए। जब धम्म विद्या को सभी के लिए सुलभ बनाने का प्रयास करता है, तो वह सद्धम्म बन जाता है। चतुवर्ण प्रणाली के अनुसार केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही ज्ञान प्राप्त कर सकते थे। शुद्र मे अंगुलिमाल, खुनी, आम्रपाली, नर्तक, उपाली, नाई आदि अनेक जातियों के लोगों को अपने भिक्षु संघ में शामिल किया और कहा कि विद्या को सभी के लिए मुक्त करना ही सद्धम्म है।

4. खोखले पांडित्य का अभाव, अहंभाव का अभाव ही सद्धम्म है। केवल विद्वान होना ही महत्वपूर्ण नहीं है। इससे पंडित के कड़वे होने की प्रवृत्ति पैदा होती है। कोई व्यक्ति कितना भी विद्वान क्यों न हो, अच्छा यही है कि वह अपने आप को इतना महान न समझे कि दूसरों को तुच्छ समझे। विद्या के साथ विनय का होना सधम्म है।

5. ज्ञान की आवश्यकता को स्वीकार करना सद्धम्म है ।धम्म सद्धम्म बन जाता है जब यह ज्ञान की आवश्यकता सिखाता है। भगवान बुद्ध ने प्रज्ञा और विद्या में अंतर बताया है। विद्या केवल ज्ञान है, प्रज्ञा उचित-अनुचित का विचार करने वाली बुद्धि है। चूँकि बुद्धि के बिना ज्ञान हानिकारक होता है, इसलिए बुद्ध ने सद्धम्म में बुद्धि को अधिक महत्व दिया। ज्ञान प्राप्त करना सद्धम्म है।



6. शील की आवश्यकता को पहचानने का अर्थ है सद्धम्म ।शील का अर्थ है सदाचार, अनुशासन, शील को ज्ञान के साथ होना चाहिए जब धम्म ऐसा सिखाता है तब यह सद्धर्म बन जाता है। बुद्धि आवश्यक है लेकिन शील अधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि शील के बिना बुद्धि भयानक है। प्रज्ञा  धम्म है जिसका अर्थ है सोचने का सही तरीका और शिल आचार धम्म है। जिसका अर्थ है व्यवहार करने का सही तरीका। भगवान बुद्ध ने शील के संबंध में पांच सिद्धांत कहे ● इसे पंचशील कहा जाता है भगवान बुद्ध कहते हैं कि शीला आदि और अंत है। यह समस्त कल्याण का स्रोत है। चूँकि यह सभी अच्छी अवस्थाओं में सर्वोत्तम अवस्था है,। इसलिए यह सद्धम्म है कि प्रज्ञा के साथ शीला भी होनी चाहिए।

7. करुणा की आवश्यकता को पहचानना सद्धम्म है। 
धम्म तभी सद्धम्म बनता है जब धम्म उसे प्रज्ञा और शील के बिना करने की आवश्यकता बताता है।  प्रज्ञा धम्म का स्तंभ है और करुणा भी धम्म का स्तंभ है। बाबा साहब अंबेडकर ने जोर देकर कहा था।

 करुणा के बिना सम्मान नहीं हो सकता। 
करुणा स्नेह की भावना है, दूसरे के प्रति प्रेम की भावना है। बिना करुणा के अधिक प्रभावशाली नहीं हो सकता। इसलिए, प्रज्ञा और शील के साथ संबंध की आवश्यकता को पहचानना सधम्म है।


8. मित्रता की आवश्यकता को पहचानना ही सद्धम्म है। जब धम्म करने से अधिक मित्रता के महत्व पर जोर देता है, तो यह सद्धर्म बन जाता है। करुणा का अर्थ है सभी प्राणियों के प्रति दया, जबकि मैत्री का अर्थ है सभी प्राणियों के प्रति प्रेम। भगवान बुद्ध सिखाते हैं कि व्यक्ति को सभी जीवित प्राणियों से प्रेम करना चाहिए और केवल करुणा करने तक ही नहीं रुकना चाहिए। करुणा हृदय की स्वतंत्रता है, यह सभी अच्छे कर्मों को समाहित करती है, इसलिए भगवान बुद्ध ने मित्रता अर्थात सद्धम्म को अधिक महत्व दिया।

9. मनुष्य की महानता उसके जन्म पर नहीं बल्कि उसके कर्मों पर आधारित होती है। भगवान बुद्ध ने जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था का विरोध किया। क्योंकि इन दोनों व्यवस्थाओं ने मनुष्य की महानता जन्म से ही तय कर दी है। •व्यक्ति के गुण या कार्य को कोई महत्व नहीं दिया गया। बुद्ध धम्म ने मनुष्य को शुद्ध कर्म करने की शिक्षा दी है। यह सद्धम्म है कि कर्म से ही व्यक्ति महान बनता है।

10. मनुष्य-मनुष्य के बीच का भेद मिटाना ही सद्धम्म है। धम्म समानता सिखाता है। किसी भी तरह से मनुष्य-मनुष्य में अंतर नहीं होना चाहिये। इसलिए भगवान बुद्ध जाति-वर्ण के विरोधी थे। मानव-मानव में समानता का भाव रखना, श्रेष्ठता-हीनता का नाश करना ही सद्धम्म है।

इस प्रकार डॉ. के विचार बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक बुद्ध एंड हिज धम्म में इस बात पर जोर दिया है कि बौद्ध धम्म अन्य धर्म से किस प्रकार भिन्न है। वह इसे इस प्रकार समझाते हैं। ईश्वर में विश्वास, आत्मा में विश्वास, प्रार्थना द्वारा ईश्वर की आराधना, यज्ञ आदि सभी धर्म शब्द से व्यक्त होते हैं। इस प्रकार धर्म की भाषा. बाबा साहेब अम्बेडकर ऐसा करते थे. यदि हम धर्म के इस अर्थ पर विचार करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भगवान बुद्ध जिसे धम्म कहते हैं वह धर्म से बहुत भिन्न है। धम्म सामाजिक है, धम्म का अर्थ है जीवन के सभी क्षेत्रों में अच्छा आचरण। इससे यह स्पष्ट है कि यदि मनुष्य अकेला है तो उसे धम्म की आवश्यकता नहीं है। लेकिन जब दो लोग किसी रिश्ते में एक साथ आते हैं, चाहे वे इसे पसंद करें या नहीं, धम्म वहां है, इससे बच नहीं सकते। तो डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर कहते हैं कि धम्म के बिना समाज का अस्तित्व नहीं हो सकता। बुद्ध ने अपने धम्म में ज्ञान और करुणा को विशेष स्थान दिया है। प्रज्ञा का अर्थ है शुद्ध बुद्धी।  
 करुणा प्रेम की भावना है, करुणा के बिना समाज जीवित नहीं रह सकता ।या प्रगति नहीं कर सकता। इसलिए बुद्ध धम्म ज्ञान और कर्म पर आधारित है। धम्म ने आचरण को बहुत महत्व दिया है। बुद्ध के धम्म में नीति का विशेष स्थान है। क्योंकि नीति का अर्थ है धम्म और धम्म का अर्थ है नीति। बुद्ध का धम्म एक खोज है क्योंकि यह पृथ्वी पर जीवन के गहन अध्ययन से उभरा है। बुद्ध ने अपने धम्म को कल्पना पर आधारित नहीं किया था, इसलिए उन्होंने काल्पनिक देवताओं, आत्माओं, स्वर्ग, नर्क और पुनर्जन्म को अस्वीकार कर दिया। बुद्ध धम्म का मुख्य उद्देश्य मानव कल्याण को बढ़ावा देना है।

धन्यवाद !












Sunday, October 15, 2023

निवडणूकच्या वेळी मतदान कबाब , शबाब आणि गांधींच्या पाठीमागे न लागता मतदान करून चळवळीची ताकद दाखवा -अँड प्रकाश आंबेडकर

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धर्मांतर घोषणेचा वर्धापन सोहळा संपन्न .

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 निवडणूकच्या वेळी मतदान कबाब , शबाब आणि  गांधींच्या पाठीमागे न लागता मतदान करून  चळवळीची ताकद दाखवा

-अँड प्रकाश आंबेडकर 

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 आता लाखो ओबीसी धर्मांतर करीत आहेत संपूर्ण देशात महापुरुषांचा विचार पसरावा लागेल.

- डॉ भीमराव य आंबेडकर 

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येवला ,जि.नाशिक ( दि.13/10/2023)- आपले डोके आपल्याच खांद्यावर पाहिजे , दुसऱ्याच्या खांद्यावर दिले तर घात होणार आणि त्याचा अनुभव आपण घेतला ,दुसऱ्याच्या डोक्याने चालण्याची सवय झाली आहे ,तसेच आपण एखादे अनुकरण करायला लागलो तर ते हिताचे आहे किंवा नाही याचा विचारच करत नाही असे प्रतिपादन डॉ बाबासाहेब आंबेडकर यांचे नातू व वंचित बहुजन आघाडीचे सर्वोसर्वो  अँड प्रकाश तथा बाळासाहेब आंबेडकर यांनी  दि बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया व येवला मुक्ती भूमी प्रतिष्ठानच्यावतीने मुक्ती भूमी ,येवला येथे  डॉ बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या  धर्मांतर घोषणेच्या  88 व्या वर्धापन दिना निमित्त आयोजित केलेल्या कार्यक्रमात केले. यावेळी मंचकावर डॉ भीमराव य आंबेडकर (ट्रस्टी /राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष ,दि बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया व राष्ट्रीय अध्यक्ष ,समता सैनिक दल ),वंचितचे युवानेते  सुजात दादा आंबेडकर ,प्रा अंजलीताई आंबेडकर , आनंदराज आंबेडकर व मनीषाताई आंबेडकर , एस के भंडारे (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ,दि बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया ),भिकाजी कांबळे (अध्यक्ष ,महाराष्ट्र राज्य ,दि बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया ), वंचितचे शमिमा पाटील व पवन पवार इत्यादी प्रमुख उपस्थित होते.

      अँड  प्रकाश तथा बाळासाहेब  आंबेडकर यांनी पुढे  सारांशाने असे म्हणाले की, डॉ बाबासाहेबांची क्रांती वर आरूढ झालो पण ती वाढविण्याचा प्रयत्न केला नाही,डॉ बाबासाहेब का हरले याचा विचार केला नाही , राजकीय भानाचा अभाव होता त्यावेळी दोन मते देण्याचे अधिकार होते ,दोन्ही मते डॉ बाबासाहेबांना दिले असते तर डॉ बाबासाहेब हरले नसते  ,डॉ बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या सामाजिक सांकृतिक आविष्कारासाठी आला आहात तर हा परिवर्तन चा लढा चालू राहील  एक पिढी दोन पिढी चालू राहील ,जात व्यवस्था मधून मुक्त झालो  नाही माणूस म्हणून जगायला पाहिजे पण आपण ते करत नाही, निवडणूकच्या वेळी मतदान करताना कबाब, शबाब  आणि गांधींच्या पाठीमागे का लागतो असा प्रश्न विचारून आता  चळवळी बरोबर राहावे व चळवळ म्हणजे मतदान करून चळवळीची ताकद दाखविले पाहिजे असे आवाहन केले.

     डॉ.भीमराव य आंबेडकर ( ट्रस्टी /राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष )  यांनी असे सारांशाने  प्रतिपादन केले की ,डॉ बाबासाहेब आंबेडकर यांचे धम्मचक्र आम्ही  देशभर घेऊन गेलो ,आता लाखो ओबीसी धर्मांतर करीत आहे त्यामुळे सरकार जनगणना करत नाहीत ,काळाराम मंदिर सत्याग्रहला आता 100 वर्षे होत आहे पण देशात फरक पडला नाही, त्याचा  गांभीर्यानं विचार करत नाही, राष्ट्रपती मुर्मु यांना  मंदिरात प्रवेश दिला नाही त्याबद्दल कोण बोलत नाही,महाराष्ट्रात काही बदल घडू शकेल असे दिसत नाही इतर राज्यात ओबीसीपुढे आले आहेत , पण महाराष्ट्रात ओबीसीला समजून सांगावे लागेल कारण महात्मा जोतिराव फुले यांच्या सत्यशोधक समाज संघटनेस 150  वर्ष झाल्याचा कार्यक्रम महाराष्ट्रत झाला नाही पण दिल्लीत सैनी समाजाने कार्यक्रम घेतला.संपूर्ण देशात महापुरुषांचा विचार पसरावा लागेल असे आवाहन केले.

  वंचितांचे युवा नेते सुजात आंबेडकर यांनी, यावेळी  वंचित बहुजन आघाडीचा आवाज आर एस एस व दिल्लीत मोदी व अमित शाह पर्यंत  पोहचला पाहिजे  असे आवाहन केले असता , वंचित बहुजन आघाडी नावाचा प्रचंड जयघोष उपस्थितांनी केला. 

  एस के भंडारे ( राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व स्टाफ ऑफिसर ,समता सैनिक दल ) यांनी, डॉ बाबासाहेब आंबेडकर यांनी भारतीय संविधानाच्या माध्यमातून आपणास स्वातंत्र्य , स्वाभिमानाचे जीने दिले आहे ते  काढून घेऊन संविधान बदलण्याचे कट कारस्थान चालू आहे. त्यामुळे ते हाणून पाडण्यासाठी संविधानाचे विरोधकांना खाली ,घरी बसवावे लागेल आणि संविधानाचे समर्थकांना सत्तेत बसवावे लागेल असे आवाहन करून त्यासाठी दि बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया / समता सैनिक दल काम करणार व गरज पडल्यास रस्त्यावर येईल असे सांगितले.या कार्यक्रमाच्या अध्यक्षस्थानी प्रविण बागुल होते व सूत्रसंचालन  राजू जगताप यांनी केले. यावेळी भंते सुमेध बोधी यांच्या नेतृत्वाखाली श्रामनेर शिबिर घेण्यात आले त्यासाठी केंद्रीय शिक्षक म्हणून मनोज गाडे ,प्रकाश जगताप ,मनोज मोरे यांनी  प्रशिक्षण दिले. तसेच  यावेळी समता सैनिक दलाच्यावतीने सकाळी अँड प्रकाश तथा बाळासाहेब आंबेडकर यांच्या प्रमुख उपस्थित मानवंदना व रॅली काढण्यात आली तसेच धावणे ,कब्बडी ,लाठीका ठी इत्यादी स्पर्धा घेण्यात आल्या ,विजयी महिला /पुरुष सैनिक ,अधिकारी यांना डॉ भीमराव य आंबेडकर यांच्या हस्ते एस के भंडारे ,समता सैनिक दलाचे अशोक कदम ,डी एम आचार्य ,मोहन सावंत यांच्या उपस्थितीत  ट्रॉफी देण्यात आल्या. धर्मांतर घोषणेचा वर्धापन दिन कार्यक्रमास जनता ,

सैनिक , कार्यकर्ते प्रचंड संख्येने उपस्थित होते.







Saturday, October 14, 2023

पश्चिम बंगाल राज्य शाखा के जिला शाखा हुगली में कार्यकर्ता शिविर संपन्न।

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              दि बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ़ इंडिया

       संस्थापक अध्यक्ष :  डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर 

   राष्ट्रीय संरक्षक :  आदरणीय महाउपसिका मिराताई आंबेडकर 

ट्रस्टी चेअरमन डॉ. हरीश रावलिया

राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष : डॉ .भीमराव यशवंत अंबेडकर

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दि बुध्दिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया शाखा, हुगली जिला, 

पश्चिम बंगाल राज्य शाखा आयोजित जिला कार्यकारिणी गठन और एक दिवसीय कार्यकर्ता शिबीर बडे उत्साह के साथ संपन्न किया |

इस अवसर पर प्रमुख अतिथि, मार्गदर्शक संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष  एवं पश्चिम बंगाल के प्रभारी आद. जगदीशजी गवई और विशिष्ट अतिथि के रूप में संस्था के राष्ट्रीय सचिव, एवं पश्चिम बंगाल के प्रभारी आद. बसंत पराड गुरूजी उपस्थित हुए थे |

यह कार्यक्रम हुगली जिला के रविंद्र नगर में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर सभागार में संपन्न हुआ | आद. श्रीकांत जी राम, राज्य शाखा अध्यक्ष, इनकी अध्यक्षता में संपन्न हुआ, और सुत्र संचालन महामंत्री आयु. बच्चा लालजी राम ने किया |

इस शिविर के अंत में हुगली जिला शाखा कार्यकारिणी का चयन किया गया और जिला कार्यकारिणी के मुख्य पदाधिकारियों के निम्न नाम घोषित किये गये। उपस्थित सभी सदस्यों ने‌ कार्यकारिणी के पदाधिकारियों का स्वागत किया गया |

हुगली जिला कार्यकारिणी निम्न प्रकार की है |

अध्यक्ष :आद.के.एल. दास, (रिटायर्ड जनरल मैनेजर);

 महामंत्री : आयु. बासुदेब बेपारी,  

कोषाध्यक्ष : आयु ब्रीज नन्दन, 

आयु बिजोय कुमार दास, उपाध्यक्ष (प्रचार-पर्यटन विभाग), 

आयु. कालिदास बारुरी, आयु  सबुज मिस्री,   ऑडिटर,

 आयु अशोक बिश्वास, कमिटी सदस्य

 इस प्रकार उपरोक्त सात नामों की घोषणा कर के बाकी सभी रिक्त पदों का चयन तथा घोषणा करने का अधिकार मुख्य पदाधिकारीयों को दिया तथा राज्य शाखा के सलाह से भरने का अधिकार 

दिया |


बच्चा लालजी राम

महामंत्री

दि बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया

पश्चिम बंगाल राज्य शाखा

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Sunday, October 8, 2023

बाबासाहब आम्बेडकर ही आधुनिक बुद्ध है -बी एच गायकवाड़

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 बाबासाहब आम्बेडकर ही आधुनिक बुद्ध है -बी एच गायकवाड़ 

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दि बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ़ इंडिया ही शिखर संघठन है-एड एस एस एस वानखेड़े


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बाबा साहब की संकल्पना के अनुसार ही समाज निर्माण का किया जा रहा कार्य- चरनदास ढेंगरे

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जिला स्तरीय कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर सम्पन्न।

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बालाघाट :  दिनांक 7 अक्टुबर को जिले के किरनापुर तहसील के ग्राम भालवा सर्कल मुख्यालय में दि बुद्धिस्ट सोसायटी आफ इंडिया के जिला शाखा के तत्वावधान में एक दिवसीय कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर सम्पन्न हुआ। जिसमें सैकडो धम्म अनुयायियों ने अपनी उपस्थिति दी।

 इस दौरान सामूहिक पूजा वंदना व अतिथियों के स्वागत पश्चात संस्था के मध्यप्रदेश राज्य शाखा के अध्यक्ष चरनदास ढेंगरे जी द्वारा दीप प्रज्जवलित कर शिविर का उदघाटन किया|

 उन्होने बताया कि बाबा साहब के संकल्प अनुसार आदर्श बौद्ध समाज के निर्माण हेतु संस्था द्वारा 24 प्रकार के धम्म प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन किया जाता है। 

इस प्रशिक्षण शिविर में मुख्य अतिथि एवं मुख्य प्रशिक्षक बी.एच.गायकवाड गुरूजी राष्ष्टीय सचिव एवं म.प्र. के प्रभारी मुंबई, प्रमुख अतिथि वानखेडे सर राष्ट्रीय सचिव साउथ राज्यो के प्रभारी मुंबई, चरनदास ढेंगरे म.प्र. राज्य शाखा के अध्यक्ष, बी.सी. सहारे प्रदेश कोषाध्यक्ष भोपाल, शिविर की अध्यक्ष संस्था जिलाध्यक्ष एस.एल.रंगारे द्वारा की गई थी। स्वागत अध्यक्षता विनय मेश्राम, सर्कल अध्यक्ष भालवा थे।

 विशिष्ट अतिथि के रूप में साधना ढेंगरे केन्द्रीय शिक्षिका व DO एसएसडी, देवानंद रंगारे जिला उपाध्यक्ष, के.के.भालाधरे, पी.डी.भालाधरे, दुरेन्द्र सावनकर अध्यक्ष किरनापुर बी.एल घल्लेकर, पुरनलाल मेश्राम, गौतम भिमटे, उमाताई मेश्राम किरनापुर, संजना खोब्रागडे, देवेन्द्र रंगारे, गौरव भालाधरे, मालवा से जितेन्द्र रंगारे, ग्राम से योगराज पटले अध्यक्ष, महासचिव संजय भौतेकर, उपाध्यक्ष डा. सुभाष चंद्र रंगारे आदि ने शिविर सफल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

 बी.एच. गायकवाड गुरूजी ने आदर्श जीवन जीने के अनेक टिप्स दिये। उन्होने कहा कि बाधिसत्व बाबा साहब ही आधुनिक बुद्ध है, अगर बाबा साहब नही होते तो हमे तथागत बुद्ध नही मिलते।

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ग्राम जालूकी में आयोजित हुआ एक दिवसीय बौद्ध कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर

  डीग/अलवर, 24 मई 2026 दि बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया अर्थात भारतीय बौद्ध महासभा उत्तरी राजस्थान की जिला शाखा डीग के तत्वावधान में ग्राम जाल...